Daily Inspirations – 07.Aug.2018

Daily Inspiration from Babaji in Hindi, followed by the English translation. Sairam.

जब मै कहता था घड़ी दो घड़ी आंख बंद करके बैठ जाओ।।पर मै अब तुमसे ये कह रहा हूँ,कि घड़ी आधी घड़ी तुम दूसरों को भूल जाओ,और तुम्हारे पास तो चौबीस घंटे पड़े हैं,और तेईस घंटे तुम सारी दुनिया को दे दो,बाजार को दे दो,मकान को दे दो,दुकान को दे दो,जिसको देना है दे दो,पर क्या तुम इतने भी अधिकारी नही हो,कि एक घण्टा तुम अपने आप को दे सको,शायद चौबीस घण्टे बचाना बहुत मुशिकल हो,पर एक घण्टा बचाना आसान हो सकता है,और मै तुमसे ये भी नही कहता हूँ कि,इस एक घंटे को बचाने के लिए हिमालय की किसी गुफा मे जाकर बैठ जाओ,पर मै कहता हूँ तुम्हारा घर ही पर्याप्त है,और सबसे ज्यादा आसान जगह है,क्योंकि वहां जो भी है,उन सबसे तुम परिचित हो,।अौर एक घण्टे के लिए उन सबको भूल जाना कोई मुशिकल बात नही है, आज नही तो कल,कल नही तो परसों तुम स्वयं’चुपचाप बैठ ही जाओगे।।

बहुत विषय आयेंगे तुम मत रस लेना उनका ,न पक्ष मे, न ही विपक्ष मे,उनको आने देना और जाने देना,,रास्ता है,, मन की राह है,ये तो चलती है,,तुम राह के किनारे बैठे देखते रहना ,और तुम चकित होंगे,तुम्हारे साक्षी भाव से,सिर्फ साक्षी भाव से।जैसे की तुमको कोई लेना देना नही, की कौन आ रहा है,कौन जा रहा है,तुम चुपचाप सड़क के किनारे बैठे ही रहना।जल्दी ही वो घड़ी आ जायेगी,और ये रास्ते की भीड़ कम होने लगेगी।।क्योंकि इस भीड़ का, इस रास्ते पर होने का कारण है,क्योंकि तुमने ही इसको निमंत्रण दिया है,तुमने अब तक इसका हर दिन स्वागत किया है,ये बिना भुलाये नही आया है।जब ये देखती है, तुम इतनी उपेक्षा से भर गए हो,,की तुम तो पीछे मुड़ कर भी नई देखते हो,,, की कौन आया, कौन गया, अच्छा था की बुरा।सुन्दर था या की असुन्दर,अपना था की पराया था ,शांत हो जाओ,ये भीड़ धीरे धीरे वीदा होने लगेगी।

ध्यान की प्रकिया बड़ी सरल है।।बस तुमको थोड़े से धैर्य की, आवश्यकता है, और खोने को है क्या।। और अगर कुछ न भी मिला।।तो सोचो एक घण्टा भर आराम ही हो जायेगा।।लेकिन मै जानता हूँ।अपने अनुभव से,, और उन हज़ारो लोगों के अनुभव से,, जिनको मैने इस प्रक्रिया से गुजरा है।।एक दिन वो घड़ी आ जाती है,और मन का रास्ता खाली हो जाता है।।और जानने को कुछ भी बाकी नही रह जाता है और जब जानने को कुछ भी बाकी नही रह जाता है,तब फिर जानने वाला ही बाकी रह जाता है,और उस जानने वाले को,अब कोई और उपाय नही किसी और को जानने का।।

सिवाये अपने को जानने के,खूद को जानना तो तुम्हारा अधिकार है,और एक बार भी अगर तुमने अपने आप का स्वाद ले लिया ,तो समझ लो, तुमने अमृत का स्वाद ले लिया,फिर कोई अंधेरा नही होगा, ना ही फिर कोई अचेतना है,फिर वो एक घड़ी धीरे-धीरे तुम्हारी चौबीस घड़ीयो तक पहुँच जायेगी।।रहो फिर बेशक तुम बाजार में।रहोगे तो फिर भी घर में, वो ही होगे साथी, वही होगा परिवार। वो ही होंगे रिस्तेदार।लेकिन फिर तुम ,भो नही होंगे।फिर तुम्हारे जीवन में क्रांति घटिहत हो जायेगी,तुम्हारे देखने का नज़रिया।।तुम्हारी आंखे बदल जायेंगी।,,बस एक शांति,,एक ऐसी शांति ,की उसकी गहराई कभी नाप ही नही सकते,और एक प्रकाश,और एक इस प्रकाश,जिसमे न तो कोई तेल है,, न कोई बाती,बिन बाती बिन तेल,,इसलिए उसका चुकने का कोई सवाल ही नही।।।

।।।। — शिवानंद, 07.08.2018

English Translation:
I have told you before to close your eyes and sit down for an hour or two. Now I am telling you, for an hour or half an hour, forget about everyone else. In the 24 hours that you have every day, you give 23 hours to the world – be it the bazaar or home, shops, give it to whomever you want to. I am asking you aren’t you entitled to devote one hour to yourself? It might be difficult to give all the 24 hours, however one hour should be easy. I am not asking you to go to some Himalayan cave and sit there for an hour, all I am saying is within the precincts of your home (this is a very easy place to be in), where all the people are known, it is not difficult to close your eyes and forget about them for an hour. If not today, not tomorrow or the day after, one day soon you will automatically become silent.

Many things will come but do not indulge them; some for you, some against you – let them come, let them go. This is the way of the mind, it will keep on happening, you sit on the banks of the pathway and just observe and become amazed/wonder-struck by only the ‘witness’. Like you have nothing at all to do with these happenings, like you are not bothered by who is coming or going, you just sit quietly on the side of the road. Very soon a time will come when the crowds of this street(thoughts of the mind) will begin to reduce.

The reason this particular street is crowded is only because of your personal invitation. You have welcomed this every day until now, these do not come without an invitation. When they sense your indifference, when they see that you don’t even give a backward glance to find out who has come or gone, whether it is good or bad, beautiful or ugly, friends or strangers, ‘you’ become peaceful and gradually the crowd starts dispersing.

The process of meditation is very easy(effortless) indeed! All you need is courage and anyway, what do you have to lose? Even if you don’t get anything, you always get an hour’s rest or relaxation. But I know from my personal experience and the experience of the thousands who have undertaken this process of meditation – one day, the hour will come when the pathways of the mind become empty! And there will be nothing left to know. And when there is nothing left to know, only the ‘true self'(person) is left and this entity no more needs reasons to know about others.

Wanting to know about your own self or knowledge of your self is your right(entitlement) and if you have taken a taste of your true self even once, understand that you have partaken the divine nectar or Amrith, and then there is no darkness at all, there is no more ‘Achetana’ (lack of consciousness) and your one hour will gradually extend to become 24 hours.

Be wherever you have to be – the bazaar, wherever- yet you will be completely at home, that will become your companion, your family, your relatives. Your life will undergo a revolutionary change, there will be a fundamental paradigm shift in the way you see things. There will just be peace, a type of peace whose depth cannot be gauged! And a light, a particular light – which has neither oil nor wick, this light that burns without oil or wick, so there is no possibility of it ever diminishing!