Spirituality

ध्यान लगाना नही, ध्यान हटाने की कला का नाम “अध्यात्म” हैं।इस मन की एक खास प्रवृति है कि उसे जहाँ भी रस मिलता है वही रम जाता है। वह चाहे स्त्री हो,चाहे नशा हो,चाहे धर्म हो, चाहे धन हो,वह उसी को पकड़ बैठता है,और उसकी पकड़ता जितनी मजबूत होती जाती है,वह उतना ही उसमें उलझता जाता है।और इस उलझन को सुलझाने का नाम ही “अध्यात्म”है।। बाबाजी।।

Spirituality is the art of withdrawing your attention rather than focusing it upon something. This mind has the unique characteristic of being drawn to or obsessed with anything that is attractive or addictive; be it a woman or intoxication or religion or wealth. The mind then latches onto that object of attraction and tightens its grip on it. As its obsession grows with the object, so does its entanglement because of it. Spirituality is all about disentangling or disengaging from these obsessions which the mind gets caught up with. – – Babaji

La espiritualidad es el arte de retirar su atención en lugar de centrarla en algo. Esta mente tiene la característica única de sentirse atraída u obsesionada con cualquier cosa que sea atractiva o adictiva; ya sea una mujer, una intoxicación, una religión o una riqueza. La mente entonces se aferra a ese objeto de atracción y aprieta su agarre sobre él. A medida que su obsesión crece con el objeto, también lo hace su enredo debido a él. La espiritualidad se trata de desenredar o desengancharse de estas obsesiones con las que la mente queda atrapada. — Babaji

ध्यान लगाना नही, ध्यान हटाने की कला का नाम “अध्यात्म” हैं।इस मन की एक खास प्रवृति है कि उसे जहाँ भी रस मिलता है वही रम जाता है। वह चाहे स्त्री हो,चाहे नशा हो,चाहे धर्म हो, चाहे धन हो,वह उसी को पकड़ बैठता है,और उसकी पकड़ता जितनी मजबूत होती जाती है,वह उतना ही उसमें उलझता जाता है।और इस उलझन को सुलझाने का नाम ही “अध्यात्म”है।। बाबाजी।।

बाबाजी द्वारा दिया गया उपरोक्त संदेश बहुत ही गूढ़ अर्थ समेटे हुए है। इसे समझने की आवश्यकता है।

सबसे पहले तो ध्यान शब्द को समझें। यहां पर बाबाजी ध्यान लगाने की क्रिया को शाब्दिक अर्थ में ले रहे हैं। इस ध्यान का अर्थ Meditation या आध्यात्मिक ध्यान नहीं है। इसका अर्थ उन बातों या विषय वासना में रम जाने से है जो मनुष्य को पथभ्रष्ट कर देती है। अतः बाबाजी हमारा ध्यान उन बातों से हटाने को कह रहे हैं जो इश्वर प्राप्ति के मार्ग की बाधा हैं।

सामान्य तौर पर आध्यात्म शब्द का प्रयोग इश्वर सम्बन्धी बातों या कार्यों के लिये किया जाता है पर वासतव मे यह सही नहीं है। आध्यात्म शब्द दो बातों से मिल कर बना है। आध्य और आत्म । आध्य का अर्थ है अध्ययन करना और आत्म का अर्थ है स्वयं का अर्थात स्वयं का अध्ययन करना, स्वयं को जानना या खोजना । अतः यदी हम विषय वासना पर ध्यान केन्द्रित करेंगे तो स्वयं को खोजने के मार्ग पर कभी भी आगे नहीं बढ पायेंगे। इसलिये उन बातों से ध्यान हटाना ही होगा। यह एक बहुत ही कठिन कार्य है जिस कारण बाबाजी नें उसे एक ‘कला’ कहा है। सदगुरु इस कला को अच्छी तरह जानते हैं और इसीलिए उनकी शरण में जाना आवश्यक है।

एक सामान्य मनुष्य, षड विकारों से ग्रस्त होता है। काम, क्रोध, लोभ,मोह, मद और मत्सर। काम,क्रोध, लोभ और मोह का अर्थ सभी समझते हैं, मद का अर्थ है उन्माद और मत्सर का अर्थ है ईर्ष्या । बाबाजी ने जिन विषय विकारों की बात की है उनमें से ‘धर्म’ के उल्लेख को समझना आवश्यक है।

मेरा धर्म हिन्दू है। मेरा धर्म मुस्लिम है या जैन है या बौद्ध है या ईसाई है, इत्यादि। सामान्य रूप से हम इन शब्दों को धर्म कहते हैं पर वास्तव में ये सब सम्प्रदाय हैं। धर्म का अर्थ एक विशिष्ट प्रकार की नियमावली है, एक आचार संहिता है जिसका पालन करने का हम खोखला दावा करते हैं। खोखला इसलिए क्योंकि हम दावा तो करते हैं पर उस पर अमल जरा भी नहीं करते। वर्तमान में धर्म शब्द गलत रुप से प्रयोग होने के कारण उन्माद का कारण बन चुका है। सच्चा धार्मिक मनुष्य कभी भी अहंकारी या उन्मादी नहीं हो सकता।

बाबाजी मूल रुप से यही कह रहे हैं कि इन षड विकारों से, बुराईयों से, वासनाओं से, धर्मान्धता से जब तक दूरी नहीं बनाओगे तब तक ना तो ईश्वर प्राप्ति के मार्ग पर चल पाओगे और ना ही स्वयं को खोज पाओगे।

संत-महात्माओं ने कहा है कि चंदन की लकड़ी स्वयं में दिव्य सुगंध समाहित किये होती है पर बहुत समय तक पडे रहने पर उसपर धूल मिट्टी की परत जम जाती है और सुगंध के स्थान पर दुर्गंध आने लगती है। यदि उस लकड़ी को थोडा घिस दिया जाये तो वह मैली परत हट जाती है और पुनः चंदन की दिव्य सुगंध आने लगती है।

हम सब उसी मैली परत चढ़ी हुई लकड़ी के समान हैं जो दुर्गंध फैला रहे हैं। सदगुरु बाबाजी, इस मैली लकड़ी को घिसने की ” कला ” अच्छी तरह जानते हैं। हमारे पास उनकी शरण में जाने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं है।

विषय वासनाओं की उलझन को सुलझाने का मार्ग केवल बाबाजी ही बता सकते हैं।

Spirituality is the art of withdrawing your attention rather than focusing it upon something. This mind has the unique characteristic of being drawn to or obsessed with anything that is attractive or addictive; be it a woman or intoxication or religion or wealth. The mind then latches onto that object of attraction and tightens its grip on it. As its obsession grows with the object, so does its entanglement because of it. Spirituality is all about disentangling or disengaging from these obsessions which the mind gets caught up with. – – Babaji

The message given by Babaji is very deep & to be understood. First of all understand the word “Dhyan”. Babaji is trying to explain the literal meaning of the word “Dhyan”. This “Dhyan” doesn’t imply meditation or spirituality. It implies the worldly desires and that which distracts a man from his path. Therefore, Babaji wants us to withdraw our attention from these distractions.

In general, the word “Spirituality” is referred to matters and subjects related to God, which is not true. “Adhyatma” word is conjunction of “Adhya” & “Atma”. “Adhya” means to study & “Atma” means self; therefore study of self, self introspection. Hence, if we focus on worldly desires, we will be lost from the path of finding ourselves. It is not easy to pursue it; that is why Babaji has called it as “Art”. It is important to surrender ourselves to Babaji as He is the master of this art.

Any man has six common worldly desires which are love, lust, anger, greed, frenzy and envy. It is important to understand the context of the word “Dharma” that Babaji has mentioned in his message. I’m a Hindu, Jain, Muslim etc… Generally we refer dharma as this, but actually they all are different sects. A religion consists of various codes of conduct which we promise to abide by, but it is a myth. Myth because we preach and not practice it. In the current situation, “Dharma” word is interpreted incorrectly and thus has led to craziness. A true religious man can never be an egoist or have frenzy. So Babaji wants us to stay away from these six worldly desires, because if we continue to be distracted by these, we will never be able to walk on the path of finding God and would never be able to explore ourselves.

Many saints & sages have discovered that Sandal wood has its own divine fragrance, yet it smells foul if kept unused for long time. A little brushing though will restore it’s divine fragrance. We all are like that unused sandal wood and Babaji has the art to incarnate each and everyone. We don’t have any other way than surrendering ourselves to Babaji. Only Babaji can guide a way through the worldly desires.