चलते रहो

 Babaji, July 2018
छोड़ो इन बातों में पड़ना मत
संसार मे बहुत सुख भरा पड़ा है॥
शायद अभी नही मिला।तो कल मिलेगा।
आज तक नही मिला है तो कल भी नही मिलेगा।

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चक्रव्यूह

“चक्रव्यूह”  Babaji, 2009

दामन जो तुमने अपना छुड़ा लिया,
एक दर्द की हुअन ने-
जख्म न जाने कितने कुरेद दिए,
तुम्हारा भी आज भ्रम टुटा-
तो पाया जीवन एक मिथ्या सपना है,

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चलना ही जीवन है, 2014

‘सड़क के किनारे पड़े-
पत्थर से मैंने पूछा’
‘तुम पाषाण क्यों हो गये।
क्यों रुक गये ये जीवन में
‘चलते रहते तो तुम्हारे भीतर लहराता जीवन,
पाषाण न बनता ।।

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तलाश, 2014

हर युग में तलाशा जाता है सत्य को –
पर सत्य कही खो जाता है,
बार-बार दोहरया जाता है यहाँ झूठ ।

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अनाम

“अनाम”  by Sri Shivananda, 2014
देह की इस गंध में अनाम सा–
इक रिश्ता है,
मन का मन से ।
सुवासित है जो यादो की महक से –
इसमें हँसी की खनखनाहट है,
माँ की ममता है,
रिश्तो की महक है ।

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भावों को अभी सवारों तुम

” भावों को अभी सवारों तुम ” – by Sri Shivananda, 2014
“भावों को अभी सवारों तुम , इतने स्पष्ट उद्गार नही।
पीड़ा को अभी ठहरने दो, स्वप्न हुए साकार नही “।।

“जब पीड़ा में तुम , तुम में ही पीड़ा – एकाकार हो जायेगी “,
“यही सृष्टि , तुम्हे प्रियो – जीवन संगीत सुनायेगी “।।

“तब फुट पड़ेगें होठों से – हृद्यगुंज में दबे विचार।
“निर्झर से कल – कल कर – रास विभोर कर जायेंगें “।।

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प्रेम का रिश्ता

” प्रेम का रिश्ता”  by Sri Shivananda, 2014
कभी माँ कभी पिता कभी भाई तो कभी बहन –
इन्ही नामो में उदित अंश हूँ ,
जनम के साथ जुड़ता और मरण के बाद भी जीवित
मैं एक अंग हूँ।।

समय के रथ पर सवार कभी मैं चलता रहा हु ,
तो कभी वस्तुओ का –
बोझ अहसहनीये होने से मैं रथ से गिर टूट जाता हूँ।।
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भ्रम

“भ्रम”  by Sri Shivananda, 2014
ढूढ़ रहा है यहाँ हर कोई एक ख़ुशी,
कोई अपने भीतर कोई अपने बाहर ।
खुशी मिली भी तो कयों पल भर में,
भ्रमित हो कर गायब हो जाती है ।
कभी खुशी के पल करीब से गुजर –
कर चले जाते है कही ।
और रह जाती है मन में इक तमन्ना –
अपनों से मिलकर भी खुशी- अधूरी रह जाती है । Continue Reading

ज्योतिपुंज

“ज्योतिपुंज” by Sri Shivananda, 2014
मेरे अंतर के गहन अंधकार में,
भोर की आहटलिए,
उदित हुआ है इक तारा ।
झिलमिल कर आह्वान किया है जिसने-
साथी चाँद सितारों को,
मेरे मन के प्रागण में अवतरित होने को । Continue Reading

अर्थ ढूढ़ रहा हूँ

अर्थ ढूढ़ रहा हूँ

करवट बदलते जीवन को-
एक पल रोक कर मैंने पूछा,
इस जीवन का अर्थ क्या है –
क्यों हम सुख दुःख महसूस करते है,
किस और बढ रहा है ये जीवन-
उफनती बहती नदी की धारा,
क्यों नहीं रूकती- Continue Reading

हे राम कब आओगे तुम

“हे राम कब आओगे तुम”  by Sri Shivananda, 2014
“हे राम कब आओगे तुम”
राम नही –
रावण एक आदर्श बनचुका है,
मानव का ।
काल की जीत, शक्ति को एकत्रित कर,
पुरे विश्व को
अपना गुलाम बना लेना चाहता है, Continue Reading