| Babaji's Poems |


| Keep Moving. चलते रहो |


Keep Moving

Don’t fall in all these things
There lies a lot of happiness in this world, 
If not now, tomorrow you will achieve 
If not till today, tomorrow also you won’t get it, 
Who says so?
Dig a bit more, you are very near
Little more efforts, retire not
Destination is not far, keep walking
Having come so far, walk a bit more
Having wasted so much life, once just give little a chance 
And then see how it won’t not happen!

 Babaji, July 2018
छोड़ो इन बातों में पड़ना मत
संसार मे बहुत सुख भरा पड़ा है॥
शायद अभी नही मिला।तो कल मिलेगा।
आज तक नही मिला है तो कल भी नही मिलेगा।

ये कौन कह सकता है,
खोदो थोड़ा और शायद जल स्त्रोत मिल जाये।
थोड़ी मेहनत और जल्दी थको मत।
मनजील ज्यादा दूर नही थोड़ा और चलो
इतना चले हो थोड़ा और चल लो॥
इतनी जिंदगी गवाई है। थोड़ी और दाव पर लगा के देख लो
और फिर नही होगा कुछ ऐसा नही है।

बाबाजी।।

| चक्रव्यूह |


With your departure come wounds,
Hurting me like never before. Today, you finally came out of your reverie,
Realising that life is, but merely an illusive metaphor.

Relationship – business in a beautiful disguise,
Like sand dunes in gusts of wind,
Forms and blows away into oblivion.

Unbreakable to me were my relationships.
How deluded I was,
I realised only after their complete annihilation.

I reflect, I ponder, I look back,
Only to see that a relationship is a synonym,
For illusion and lies.

I begin asking myself,
How much longer will my life
Battle these spurious relationships?

How much longer will Abhimanyu battle the Charavyuh,
Before he dies?

— Translated by Shrinivas Kalyani

“चक्रव्यूह”  Babaji, 2009

दामन जो तुमने अपना छुड़ा लिया,
एक दर्द की हुअन ने-
जख्म न जाने कितने कुरेद दिए,
तुम्हारा भी आज भ्रम टुटा-
तो पाया जीवन एक मिथ्या सपना है,

संबंधो के नाम पर-
लेन-देन व्यापार है, बालू की निशा-
की तरह सम्बन्ध बनते हैं,

बिगड़ते है और टूट जाते है ,
हर सम्बन्ध जो लगता था,
कभी अटूट सा-
पर टुटा जो आज सबसे नाता,
जीवन के इस मोड़ पर-
लगने लगा हर सम्बन्ध अर्थहीन बेगाना,
पूछता है मन एक प्रशन,
इस चक्व्रयुह में-
अभिन्यु बनकर कब तक लडेगा
ये जीवन ।।

| चलना ही जीवन है, 2014 |


‘सड़क के किनारे पड़े- पत्थर से मैंने पूछा’ ‘तुम पाषाण क्यों हो गये। क्यों रुक गये ये जीवन में ‘चलते रहते तो तुम्हारे भीतर लहराता जीवन, पाषाण न बनता ।।

| तलाश, 2014 |


हर युग में तलाशा जाता है सत्य को –
पर सत्य कही खो जाता है,
बार-बार दोहरया जाता है यहाँ झूठ ।

| अनाम by Sri Shivananda, 2014 |


देह की इस गंध में अनाम सा–
इक रिश्ता है,
मन का मन से ।
सुवासित है जो यादो की महक से –
इसमें हँसी की खनखनाहट है,
माँ की ममता है,
रिश्तो की महक है ।